Friday, 10 May 2013

कुछ यादें कुछ भाव और कुछ गीत

कुछ यादें कुछ भाव और कुछ गीत 



रह रह याद तुम्हारी आती ,
 ज्यों ही जलते दीप गगन में ,
भर आती चिर प्यासी छाती .
अपनापन था तुम में पाया ,







अपना सब था तुम में पाया ,
ईश्वर से था बस यही तो चाहां
तुम मेरे ही साथ रहो यूं
जैसे हो तुम मेरी ही छाया






                                                      तुम ही मेरे नयन बसी थीं ,
                                                      भाग्य में मेरे तुम तो नहीं थीं ,
                                                      सो अब तेरा कुछ न रहा में ,
                                                      जो भी रहा बस गैर रहा में
तेरे गुल का एक सूल रहा में ,
मगर ये मैंने गलत कह दिया ,
अपना दोष तुम्हें दे दिया ,
होता गर स्नेह जो तुमसे ,
                                                     क्या में  बंधा  न होता तुमसे?
                                                     जैसे चटक स्वांति बूंद से?
                                                     कुछ क्षण ही तुमने प्यार दिया
                                                     अपना सूचि अभिसार दिया,
लेकिन इतने में ही प्रिये ,
तुमने सब कुछ बार दिया था
बीते पल की पहिचान तुम्हारी
मेरे जीवन की सिर थाती,
                                                     यह सब लिखते याद है आती ,
                                                     






रह रह याद तुम्हारी आती.
























































अब कौन किससे  पूछेगा यही सब ?
अब चल रहा है जिंदगी का अबसान ,
 कई साल पहले  पहुंचा आया था तुमको शमशान ,
उम्र के इस पड़ाव में यध्यपि       
 बच्चे रखते हैं ख्याल फिर  भी ,
सोचता हूँ अब किससे कौन पूछेगा यही सब?,
 कि “बहुत देर करते हो आफिस में”
“घर कब तक आ रहे हो?”,       
 “बहुत दिन हुए कहीं बाहर गए हुए ,
कहीं बाहर घुमाने कब ले जा रहे हो?”
“अपनी शादी की तारीख १ जून पर ,
अबकी बार मेरे लिए क्या ला रहे हो?”
और में पूछता था अक्सर यह तुमसे
“काम बहुत रहता है आफिस में मेरे.
तीस वर्षों से हो तुम  साथ मेरे,
क्या तुम यह नहीं जानती हो?”
“तुम्हारे बगैर रह सकता नहीं ,
 यह तुम क्यों नहीं मानती हो?”
“बहुत बार घूमें  हैं सपरिवार हम तुम ,
 अब उलझनें है कई ये तुम जानती हो”
और तुम मान जाती थी सुन ये बातें हमारी ,
अब ये केवल में जानता हूँ या  तुम जानती हो.
कुछ गलतफहमियों में हम थे जुदा,
 मगर नोंक झोंक के बाद कहते थे सदा ,
“मियाँ बीबी की लडायी जैसे दूध पे मलाई
 यही माँ लो है इसी में भलाई”
और मान जाते थे हंसकर ये  हम  सब
आज उसी शमशान में खड़ा सोचता हूँ,
 अब कौन  किससे पूछेगा यही सब?,















 जिंदगी वाकई में क्या है?
में सोचता हूँ कि जिंदगी वाकई में क्या है?
सोचत हूँ सोचता हूँ मगर कुछ समझ आता नहीं ,
लगता है वक्त एक दरिया है जिंदगी की ज़मीन पर ,
कोशिशें लाख कीं मगर यह पकड़ में आता नहीं ,
जिंदगी भर चलता रहा हूँ अपनी मंजिल की चाह में ,
पर मेरी मंजिल क्या थी? यह समझ आया ही नहीं.
तमाम दोस्त मिले जिंदगी में चलते रहने के दौरान,
वक्त बदला वो भी बदले पर क्यों ,कोई बतलाता नहीं .
में जिससे मिला मुस्करा कर मिला हर शख्स जिंदगी में,
में चेहरा ही पढता रहा ,में दिल क्यों पढ़ पाता नहीं?
क्या सोचा था जिंदगी में मगर क्या मिला सोचता हूँ यारो,
यह जिंदगी का हिसाब किताब है कोई पढ़ पाता नहीं.
कुछ हादसे होते हैं ऐसे जिनसे  सबको गुजरना  पड़ता है
सब हादसों के शिकार हैं में कह देता हूँ कोई कह पाता नहीं.
कौन है ऐसा  जिसको वक्त ने  बनाया नहीं अपना शिकार,
मैंने आंसू ढलका दिए हैं रो कर कोई आँख से बाहर लाता नहीं .
वक्त की ही तो बात है वो साये की तरह रहते थे मेरे साथ,
 उनसे मिलना तो दूर की बात है अब चेहरा भी देख पाता नहीं
जिंदगी एक कारवाँ की तरह है और साथ इस कारवाँ के में भी हूँ ,
साथ इसके चल पाऊँगा कब तक यह समझ मुझको आता नहीं .
















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